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Biography Information

महान वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई का जीवन परिचय

Rani Laxmi Bai Biography Information In Hindi

रानी लक्ष्मी बाई का जीवन परिचय

भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक वीरो के नाम आते है जिनके नाम आते ही मन में वीरता का भाव आने लगता है और जब जब देश की क़ुरबानी की बात आती है तो पुरुषो के साथ साथ भारतीय महिलाये भी कंधे से कंधे मिलाकर आगे चलती है और इसी वीरता और बहादुरी की कड़ी में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई | Jhansi Ki Rani Laxmi Bai का नाम भी भी बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है

भारतीय इतिहास में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi Bai एक ऐसी बहादुर वीरांगना है जिन्होंने मरते दम तक अंग्रेजो की गुलामी स्वीकार नही किया और इन्ही अंग्रेजो से लड़ते हुए युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुई और आज भी उनके इस वीरगति पर लिखी गयी कविता बच्चो बच्चो तक को याद रहता है

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का जीवनी

Rani Laxmi Bai Biography In Hindi

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का जीवनी संक्षेप मे

तो चलिए आज हम इसी महान वीरांगना झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के जीवनी को जानते है जो हम सभी के लिए उनकी वीरता एक प्रेरणास्त्रोत भी है

Rani Laxmi Bai

तो रानी लक्ष्मीबाई के जीवन परिचय को जानते है

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का जीवनी
पूरा नाम :- रानी लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi Bai
अन्य नाम :- बचपन का नाम मनु, शादी के पूर्व मणिकर्णिका ताम्बे , शादी के पश्चात     लक्ष्मीबाई नेवलेकर
जन्मतिथि :- 19 नवम्बर 1828
जन्मस्थान :- वाराणसी उत्तर प्रदेश भारत
माता का नाम :- भागीरथी सापरे
पिता का नाम :- मोरोपंत ताम्बे
पति :- झाँसी के राजा गंगाधर राव नेवालकर
प्रमुख कार्य :- झाँसी की रानी, प्रथम भारतीय स्वन्त्रता संग्राम की वीरांगना
मृत्यु :- 17 जून 1858 कोटा की सराय, ग्वालियर, भारत

रानी लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi Bai का जन्म 19 November 1828 को भारत देश के उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी जिले में हुआ था इनके पिता मोरोपंत ताम्बे जो की एक मराठी थे और वे बाजीराव के सेवा में कार्यरत थे इनकी माता भागीरथी सापरे जो की धार्मिक विचारो की महिला थी जिनका प्रभाव रानी लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi Bai पर भी देखने को मिलता है

बचपन में मात्र 4 साल की आयु में ही माँ के देहांत हो जाने के बाद रानी लक्ष्मीबाई का लालन पालन इनके नाना के घर पर हुआ और इनकी सारी जिम्मेदारी पिता के कन्धो पर आ गयी जिसके कारण घर में कोई नही होने के कारण इनके पिता अपने साथ पेशवा के दरबार में भी ले जाने लगे थे जहा पर इनके पिता पेशवा के पुत्र को अस्त्र – शस्त्र चलाने की शिक्षा देते थे जिसके कारण बचपन में ही रानी लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi Bai अपने पिता के इसकी शिक्षा पाकर अस्त्र–शस्त्र चलाने में निपुण हो गयी थी.

ये बचपन से ही निडर स्वाभाव की थी और बचपन से निडर स्वाभाव होने के कारण बेख़ौफ़ होकर अस्त्र – शस्त्रों को चलाती थी जिसके कारण इनके प्रतिभा पर बाजीराव के पुत्र और तात्या टोपे भी मंत्रमुग्ध हो जाते है बचपन में इनका नाम मणिकर्णिका रखा गया था लेकिन प्यार से सभी मनु कहकर बुलाते थे इनकी शिक्षा दीक्षा घर पर ही हुआ था.

रानी लक्ष्मीबाई का विवाहित जीवन 

Rani Laxmi Bai Life History in Hindi

सन 1838 ईसवी में गंगाधर राव नेवालकर झाँसी के राजा बने जिसके पश्चात 1842 सन में लक्ष्मीबाई का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव नेवालकर से हुआ बचपन से प्यारी और दुलारी मनु मणिकर्णिका मात्र 14 वर्ष की आयु में अब झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi Bai के रूप में जाने लगी और विवाह पश्चात 1851 में पुत्ररत्न की प्राप्ति हुआ जिसका नाम दामोदर राव रखा गया जो की महज 4 माह ही जीवित रहे

जिसके पश्चात अचानक अपने बच्चे की मृत्यु गंगाधर राव नेवालकर अंदर ही अंदर दुखी रहने लगे और फिर झाँसी के राज्य को बचाने के लिए गंगाधर राव नेवालकर और लक्ष्मीबाई ने दत्तक पुत्र आनंद राव को गोद लिया जिसका आगे नाम बदलकर दामोदर राव रखा गया जिसको लेकर अंग्रेज सहमत नही थे.

फिर  21 नवम्बर 1853 ईसवी में गंगाधर राव नेवालकर अपने पहले पुत्र के वियोग में वे स्वर्ग सिधार गये जिसके पश्चात झाँसी राज्य का सारा भार अचानक से लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi के कंधो पर आ गया फिर लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi ने अपने बहादुरी और हिम्मत के दम पर अपने दत्तक पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी घोषित करते हुए राज्य का कार्य भार संभाल लिया

लेकिन अंग्रेज अपने कुटिल चालो को चलते हुए झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi Bai के इस फैसले से सहमत नही थे उनके हिसाब से राजा का पुत्र ही राज्य कर सकता है गोद लिया पुत्र उस राज्य का उत्तराधिकारी नही होगा और नियमानुसार इसे अंग्रेजो की कम्पनी ईस्ट इंडिया में मिला लिया जाएगा.

जिस कारण से अंग्रेजो के इस फैसले से झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi Bai भी तनिक नही डरी और अंग्रेजो के इस फैसले को खुलकर चुनौती दिया

और उनका यही नारा था – “मै अपनी झाँसी नही दूंगी”

और अंग्रेजो के खिलाफ अपनी सेना का संघठन प्रारम्भ किया जिसमे महिलाओ को भी प्रमुख वरीयता दी गयी जिसमे अनेक वीर सैनिक भी शामिल किये गये जिनका प्रमुख उद्देश्य अपने राज्यों को अंग्रेजो के चंगुल से आने से बचाने का प्रमुख उद्देश्य था.

झाँसी का युद्ध और रानी लक्ष्मीबाई

Jhansi War & Rani Laxmi Bai in Hindi

अंग्रेजो की हड़प नीति के चलते झाँसी के पड़ोसी राज्यों को भी अंग्रेजो के अधीन कर लिया गया लेकिन 1857 में मंगल पाण्डेय द्वारा प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम की चिंगारी पूरे भारत में फैलने लगी थी जिसके परिणामस्वरूप अंग्रेजो को पीछे हटना पड़ा लेकिन इसी दौरान झाँसी के पडोसी राज्य ओरक्षा और दतिया के राजाओ ने भी झाँसी पर आक्रमण कर दिया जिसका सामना Rani Laxmi Bai ने बड़ी ही बहादुरी से किया और इन युद्धों को विफल कर दिया

इसके बाद 1858 ईसवी में अंग्रेजी सेना झाँसी के कब्जे को लेकर आगे बढ़ना शुरू किया जिसके कारण रानी लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi Bai ने अपने 14000 सैनिको के साथ अंग्रेजो के साथ भयंकर युद्ध हुआ जिसमे अंग्रेजी सेना ने झाँसी शहर को चारो तरफ से घेर लिया था लेकिन अपने चतुराई से रानी लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi Bai अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव के साथ झाँसी से बचकर कालपी पहुच गयी.

फिर वहा तात्या टोपे के साथ मिलकर ग्वालियर किले पर कब्जा कर लिया लेकिन अंग्रेजो के धोखे की चाल की वजह से 22 मई 1858 को ह्यू रोज के नेतृत्व में ग्वालियर के किले पर फिर से आक्रमण कर दिया गया लेकिन रानी लक्ष्मीबाई ने अपने अभूतपूर्व साहस का परिचय देते अंग्रेजो को धूल चटाई जिसके कारण एकबार फिर से अंग्रेजो को पीछे हटना पड़ा

रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु

Rani Laxmi Bai Death History information in Hindi

लेकिन फिर से 17 जून 1858 को अंग्रेजी शासक किग्स रायल आयरिश ने रानी लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi Bai के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था जिसके कारण रानी लक्ष्मीबाई के सेविकाओ ने युद्ध में बहादुरी से भाग लिया लेकिन इस बार उन्हें अंदेशा हो गया था की वे अब ज्यादा देर तक अंग्रेजो से युद्ध नही लड़ पाएगी इसलिए उन्होंने युद्ध में राजा के पोशाक में थी.

और इस युद्ध के पहले ही उनका प्रिय घोडा राजरतन मारा जा चुका था और फिर अंग्रेजो से युद्ध लड़ते हुए रानी लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi Bai बुरी तरह से घायल हो गयी थी लेकिन वे कभी भी खुद को अंग्रेजो के चंगुल में नही आने दिया

फिर युद्ध से घायल अवस्था में उनके सैनिक साथियों ने पास के गंगादास मठ में ले गये और फिर यही रानी लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi Bai 17 जून 1858 अपने जीवन की अंतिम सांस लिया और फिर वीरगति को प्राप्ति हो गयी.

भले ही रानी लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi Bai एक महिला थी लेकिन अपने जीते जी हिम्मत और बहादुरी के दम पर अंग्रेजो के दांत खट्टे कर दिए थे और कभी खुद को जीते जी अंग्रेजो के हाथो नही आने दिया इस प्रकार भारतीय इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi Bai का नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया और जब जब वीरता की गाथा गाई जाएगी तो रानी लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi Bai का नाम भी जरुर लिया जायेगा.

रानी लक्ष्मीबाई के वीरता पर लिखी गयी कविता

Rani Laxmi Bai Poem in Hindi

पूरे जीवन भर बहादुरी का साथ देने वाली रानी लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi Bai वीर दुर्गा का ही रूप मानी जाती है उनके वीरता का गुणगान अनेक कवियों ने अपने कविता के माध्यम से किया है जिसमे रानी लक्ष्मीबाई | Rani Laxmi Bai के ऊपर सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा लिखी गयी कविता सबसे प्रसिद्द है तो चलिए रानी लक्ष्मीबाई पर लिखी गयी कविता को जानते है

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
‘नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तीस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

Written By:- सुभद्रा कुमारी चौहान

तो आप सबको वीरता की मिशाल झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई पर लिखा गया यह पोस्ट रानी लक्ष्मीबाई का जीवन परिचयकैसा लगा कमेंट बॉक्स में हमे जरुर बताये और इस पोस्ट को शेयर भी जरुर करे.

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का जीवनी संक्षेप मे

Rani Laxmi Bai Short Biography In Hindi

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का जीवनी संक्षेप मे
रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी के नगर में हुआ था।
उनका असली नाम मणिकर्णिका था, जिन्होंने शादी के बाद अपना नाम लक्ष्मीबाई के रूप में बदल लिया।
उनके पिता का नाम मोरोपंत ताम्बे और माता का नाम भगीरथीबाई था।
रानी लक्ष्मीबाई की शिक्षा में भारतीय संस्कृति, साहित्य और योग का अध्ययन शामिल था।
उनके विवाह का समय 1842 में गंगाधर राव के साथ हुआ था, जो जाने-माने मराठा राजा थे।
रानी लक्ष्मीबाई का एक ही बेटा था, जिसका नाम दामोदर राव था।
उनके पति की मृत्यु के बाद, उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई।
रानी लक्ष्मीबाई का नाम महाराष्ट्र के विशेष रूप से ग्वालियर और झाँसी के स्वतंत्रता संग्राम में मशहूर है।
उन्होंने ब्रिटिशों के खिलाफ जौहर का ऐतिहासिक प्रस्ताव किया था जब झाँसी शहर को ब्रिटिशों ने कब्जा किया था।
रानी लक्ष्मीबाई ने अपने साथियों के साथ महाराष्ट्रीय राजा नानासाहेब पेशवा के साथ मिलकर लड़ाई की थी।
उन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अपनी बहादुरी और साहस दिखाया था।
रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी के स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश सेना के खिलाफ लड़ाई लड़ी और उसे सफलता दिलाई।
उन्होंने अपनी सेना के साथ एक बड़ी लड़ाई में ब्रिटिश सेना को हराया।
रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु 17 जून 1858 को झाँसी के लड़के में हुई थी, जब वह लड़ाई के दौरान घायल हो गई थी।
रानी लक्ष्मीबाई को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नेतृत्व के लिए सलामी दी जाती है।
रानी लक्ष्मीबाई को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शीर्ष नायिका में गणना किया जाता है।
उनके प्रेरणादायक जीवन और वीरता की कहानी भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण है।
रानी लक्ष्मीबाई को “झाँसी की रानी” के नाम से भी जाना जाता है।
उन्होंने अपने प्रेरणादायक व्यक्तित्व और शौर्य के लिए अमर राष्ट्रीय गीत “कृष्ण कांट का वीर लड़ाकू” में उल्लेख किया गया है।
रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी और उनके संघर्ष ने भारतीय जनता को स्वतंत्रता के लिए उत्साहित किया।
उनके प्रेरणादायक कार्यों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नया आयाम दिया।
रानी लक्ष्मीबाई को भारतीय इतिहास में महिला नेतृत्व के प्रति गर्व का विषय बनाया गया है।
रानी लक्ष्मीबाई की वीरता और साहस ने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐतिहासिक चिन्ह के रूप में स्थान दिया।
उन्होंने अपने प्रदर्शन से भारतीय महिलाओं को सशक्त बनाने का संदेश दिया।
उनकी वीरता और साहस ने उन्हें भारतीय इतिहास की एक महान व्यक्तित्व बना दिया।

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