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खाटू श्याम बाबा जी की कहानी – Khatu Shyam Baba Ki Kahani In Hindi

Khatu Shyam Baba Ki Kahani In Hindi

खाटू श्याम बाबा जी की कहानी

वो कहते है ना अगर मन मे  ईश्वर के प्रति सच्चा विश्वास हो तो ईश्वर आपके हर इच्छा को जरूर पूरी करते है, और आपको हर सुख सुविधा मिलता है, जो मिलना चाहिए, तो आइये इस पोस्ट मे राजस्थान के सीकर जिले में श्री खाटू श्याम बाबा जी के बारे मे जानते है, और उनसे जुड़ी कथा – Khatu Shyam Ki Kahani In Hindi को जानते है,

बाबा खाटू श्याम जी जीवन परिचय

Khatu Shyam Baba Biography  In Hindi

Khatu Shyam Baba Ki Kahani In Hindiखाटू श्याम बाबा जी का संबंध महाभारत काल से माना जाता है। खाटू श्याम जी का असली नाम बर्बरीक है। कहा जाता है कि जन्म के समय बर्बरीक के बाल बब्बर शेर के समान थे, अतः उनका नाम बर्बरीक रखा गया।

यह पांडुपुत्र भीम के पौत्र थे। खाटू श्याम बाबा घटोत्कच और नागकन्या मौरवी के पुत्र हैं। पांचों पांडवों में सर्वाधिक बलशाली भीम और उनकी पत्नी हिडिम्बा बर्बरीक के दादा दादी थे।

पौराणिक कथा के अनुसार, खाटू श्याम की अपार शक्ति और क्षमता से प्रभावित होकर श्रीकृष्ण ने इन्हें कलियुग में अपने नाम से पूजे जाने का वरदान दिया था।

खाटू श्याम बाबा जी की कहानी

Khatu Shyam Ki Kahani In Hindi

जब पांडवो को वनवास हुआ तब वनवास के दौरान जब पांडव अपनी जान बचाते हुए भटक रहे थे, तब भीम का सामना हिडिम्बा से हुआ। जहा फिर भीम का गंधर्व विवाह हिडिम्बा से हुआ, जिसके बाद हिडिम्बा ने भीम से एक पुत्र को जन्म दिया जिसे घटोत्कच कहा जाता था।

फिर आगे चलकर घटोत्कच से बर्बरीक पुत्र हुआ। जिसके शेर की भांति सुन्दर केशों को देखकर उसका नाम बर्बरीक रखा। पांडुपुत्र भीम की तरह बर्बरीक बचपन में एक वीर और तेजस्वी बालक थे। बर्बरीक ने भगवान श्री कृष्ण और अपनी माँ मौरवी से युद्धकला, कौशल सीखकर निपुणता प्राप्त कर ली थी।

बर्बरीक ने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी, जिसके आशीर्वाद स्वरुप भगवान ने शिव ने बर्बरीक को 3 चमत्कारी बाण प्रदान किए। इसी कारणवश बर्बरीक का नाम तीन बाणधारी के रूप में भी प्रसिद्ध है। भगवान अग्निदेव ने बर्बरीक को एक दिव्य धनुष दिया था, जिससे वो तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने में समर्थ थे।

जब कौरवों-पांडवों का युद्ध होने का सूचना बर्बरीक को मिली तो उन्होंने भी युद्ध में भाग लेने का निर्णय लिया। बर्बरीक ने अपनी माँ का आशीर्वाद लिया और युद्ध में हारते हुए पक्ष का साथ देने का वचन देकर निकल पड़े। इसी वचन के कारण “हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा” यह बात जग प्रसिद्ध हुई।

जब बर्बरीक जा रहे थे तो उन्हें मार्ग में एक ब्राह्मण मिला। यह ब्राह्मण कोई और नहीं, स्वंय भगवान श्री कृष्ण थे जोकि भेष बदल कर बर्बरीक की परीक्षा लेना चाहते थे। ब्राह्मण बने श्री कृष्ण ने बर्बरीक से प्रश्न किया कि वो मात्र 3 बाण लेकर लड़ने को जा रहा है ? मात्र 3 बाण से कोई युद्ध कैसे लड़ सकते है।

इसके बाद बर्बरीक ने कहा कि उनका एक ही बाण शत्रु सेना को समाप्त करने में सक्षम है और इसके बाद भी वह तीर नष्ट न होकर वापस उनके तरकश में आ जायेगा। अतः अगर तीनों तीर के उपयोग से तो सम्पूर्ण ब्रह्मांड का विनाश किया जा सकता है।

ब्राह्मण ने बर्बरीक से एक पीपल के वृक्ष की ओर इशारा करके कहा कि वो एक बाण से पेड़ के सारे पत्तों को भेदकर दिखाए। बर्बरीक ने भगवान का ध्यान कर एक बाण छोड़ दिया। उस बाण ने पीपल के सारे पत्तों को छेद दिया और उसके बाद बाण ब्राह्मण बने कृष्ण के पैर के चारों तरफ घूमने लगा।

असल में कृष्ण ने एक पत्ता अपने पैर के नीचे छिपा दिया था। बर्बरीक समझ गये कि तीर उसी पत्ते को भेदने के लिए ब्राह्मण के पैर के चक्कर लगा रहा है। बर्बरीक बोले – हे ब्राह्मण अपना पैर हटा लो, नहीं तो ये आपके पैर को वेध देगा। और आपको चोंट लग सकती है,

इस तरह श्री कृष्ण बर्बरीक के पराक्रम से प्रसन्न हुए। उन्होंने पूंछा कि बर्बरीक किस पक्ष की तरफ से युद्ध करेंगे. बर्बरीक बोले कि उन्होंने लड़ने के लिए कोई पक्ष निर्धारित किया है, वो तो बस अपने वचन अनुसार हारे हुए पक्ष की ओर से लड़ेंगे। श्री कृष्ण ये सुनकर विचारमग्न हो गये क्योकि बर्बरीक के इस वचन के बारे में कौरव जानते थे।

कौरवों ने योजना बनाई थी कि युद्ध के पहले दिन वो कम सेना के साथ युद्ध करेंगे। इससे कौरव युद्ध में हराने लगेंगे, जिसके कारण बर्बरीक कौरवों की तरफ से लड़ने आ जायेंगे। अगर बर्बरीक कौरवों की तरफ से लड़ेंगे तो उनके चमत्कारी बाण पांडवों का नाश कर देंगे।

कौरवों की योजना विफल करने के लिए ब्राह्मण बने कृष्ण ने बर्बरीक से एक दान देने का वचन माँगा। बर्बरीक ने दान देने का वचन दे दिया। अब ब्राह्मण ने बर्बरीक से कहा कि उसे दान में बर्बरीक का सिर चाहिए.

इस अनोखे दान की मांग सुनकर बर्बरीक आश्चर्यचकित हुए और समझ गये कि यह ब्राह्मण कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है। बर्बरीक ने प्रार्थना कि वो दिए गये वचन अनुसार अपने शीश का दान अवश्य करेंगे, लेकिन पहले ब्राह्मणदेव अपने वास्तविक रूप में प्रकट हों।

भगवान कृष्ण अपने असली रूप में प्रकट हुए। बर्बरीक बोले कि हे देव मैं अपना शीश देने के लिए बचनबद्ध हूँ लेकिन मेरी युद्ध अपनी आँखों से देखने की इच्छा है। श्री कृष्ण बर्बरीक ने बर्बरीक की वचनबद्धता से प्रसन्न होकर उसकी इच्छा पूरी करने का आशीर्वाद दिया। बर्बरीक ने अपना शीश काटकर कृष्ण को दे दिया।

फिर इसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक के सिर को 14 देवियों के द्वारा अमृत से सींचकर युद्धभूमि के पास एक पहाड़ी पर स्थित कर दिया, जहाँ से बर्बरीक युद्ध का दृश्य देख सकें। इसके पश्चात कृष्ण ने बर्बरीक के धड़ का शास्त्रोक्त विधि से अंतिम संस्कार कर दिया।

महाभारत का महान युद्ध समाप्त हुआ और पांडव विजयी हुए। विजय के बाद पांडवों में यह बहस होने लगी कि इस विजय का श्रेय किस योद्धा को जाता है। श्री कृष्ण ने कहा – चूंकि बर्बरीक इस युद्ध के साक्षी रहे हैं अतः इस प्रश्न का उत्तर उन्ही से जानना चाहिए।

तब परमवीर बर्बरीक ने कहा कि इस युद्ध की विजय का श्रेय एकमात्र श्री कृष्ण को जाता है, क्योकि यह सब कुछ श्री कृष्ण की उत्कृष्ट युद्धनीति के कारण ही सम्भव हुआ। विजय के पीछे सबकुछ श्री कृष्ण की ही माया थी।

बर्बरीक के इस सत्य वचन से देवताओं ने बर्बरीक पर पुष्पों की वर्षा की और उनके गुणगान गाने लगे। श्री कृष्ण वीर बर्बरीक की महानता से अति प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा – हे वीर बर्बरीक आप महान है। मेरे आशीर्वाद स्वरुप आज से आप मेरे नाम श्याम से प्रसिद्ध हो जाओगे । और इस तरह कलियुग में आप कृष्ण अवतार रूप में पूजे जायेंगे और अपने भक्तों के मनोरथ पूर्ण करेंगे।

खाटू श्याम बाबा जी का मंदिर

Khatu Shyam temple in Hindi

खाटू श्याम जी को भगवान श्रीकृष्ण के कलयुगी अवतार के रूप में जाना जाता है। राजस्थान के सीकर जिले में स्थित श्याम बाबा के भव्य मंदिर में दर्शन के लिए हर दिन लाखों भक्त पहुंचते हैं। मान्यता है कि श्याम बाबा सभी की मनोकामनाएं पूरी करते हैं और फर्श से अर्श तक पहुंचा सकते हैं।

अब एक यह प्रश्न और बचता है की खाटू श्यामकुंड जी के मंदिर की उत्त्पत्ति कलयुग में केसे हुई या फिर खाटू श्यामकुंड जी के मंदिर का निर्माण किसने करवाया। यदि आप भी इसे बारे में सोच रहे है तो हम आपको बता दे जयपुर के सीकर जिले में स्थित प्रसिद्ध खाटू श्याम जी का मंदिर का निर्माण खाटू गांव के शासक राजा रूपसिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कंवर द्वारा सन् 1027 में करवाया गया था।

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार राजा रूपसिंह को सपना आया, जिसमें उन्हें खाटू के कुंड में श्याम का सिर मिलने के बाद उनका मंदिर बनवाने के लिए कहा गया था। तब राजा रूपसिंह ने खाटू गांव में खाटू श्याम बाबा जी के नाम से मंदिर का निर्माण करवाया। जबकि 1720 में एक मशहूर दीवान अभयसिंह ने इसका पुर्ननिर्माण कराया।

इस पोस्ट मे हमने खाटू श्याम बाबा जी के बारे जाना और और उनसे जुड़ी कथाये भी जाना, तो आपको आपको हमारा यह पोस्ट खाटू श्याम बाबा जी की कहानी – Khatu Shyam Ki Kahani In Hindi कैसा केसा लगा हमे कमेंट्स में बताना ना भूलें।

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