मीराबाई के पद दोहे हिन्दी अर्थ सहित Meerabai Ke Dohe Pad Hindi

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Meera Bai Ke Dohe Pad with Hindi Meaning 

मीरा के पद दोहे हिन्दी अर्थ सहित

मीराबाई जो की भगवान कृष्ण की अनन्य भक्त थी, उन्होंने अपना पूरा जीवन कृष्ण भक्ति में ही लगा दिया था, उनकी भक्तिमय दोहे और पद आज भी जनमानस पर भक्ति की अमिट छाप छोड़ता है, तो चलिए भगवान कृष्ण के इस भक्त मीरा के कहे गये दोहे, पद, Meera Bai Ke Dohe Pad, Meerabai Ke Dohe Pad को हिन्दी अर्थ सहित जानते है.

मीरा के दोहे पद हिन्दी अर्थ सहित

Meera Bai Ke Dohe Pad with Hindi Meaning

मीरा के दोहे पद – 1

Meera Bai Ke Dohe Pad with Hindiमेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोई|

जाके सिर मोर मुकट मेरो पति सोई||

हिन्दी अर्थ :-

मीरा कहती हैं – मेरे तो बस श्री कृष्ण हैं जिसने पर्वत को ऊँगली पर उठाकर गिरधर नाम पाया. उसके अलावा मैं किसी को अपना नहीं मानती. जिसके सिर पर मौर का पंख का मुकुट हैं वही हैं मेरे पति.

मीरा के दोहे पद – 2

मनमोहन कान्हा विनती करूं दिन रैन
राह तके मेरे नैन
अब तो दरस देदो कुञ्ज बिहारी
मनवा हैं बैचेन
नेह की डोरी तुम संग जोरी
हमसे तो नहीं जावेगी तोड़ी
हे मुरली धर कृष्ण मुरारी
तनिक ना आवे चैन
राह तके मेरे नैन ……..

मै म्हारों सुपनमा
लिसतें तो मै म्हारों सुपनमा

हिन्दी अर्थ :-

मीरा अपने भजन में भगवान् कृष्ण से विनती कर रही हैं कि हे कृष्ण ! मैं दिन रात तुम्हारी राह देख रही हूँ. मेरी आँखे तुम्हे देखने के लिए बैचेन हैं मेरे मन को भी तुम्हारे दर्शन की ही ललक हैं.मैंने अपने नैन केवल तुम से मिलाये हैं अब ये मिलन टूट नहीं पायेगा. तुम आकर दर्शन दे जाओं तब ही मिलेगा मुझे चैन.

मीरा के दोहे पद – 3

हरि आप हरो जन री भीर।
द्रोपदी री लाज राखी, आप बढ़ायो चीर।
भगत कारण रूप नरहरि, धरयो आप सरीर।
बूढ़तो गजराज राख्यो, काटी कुञ्जर पीर।
दासी मीराँ लाल गिरधर, हरो म्हारी भीर।।

हिन्दी अर्थ :-

इस पद में कवयित्री मीरा भगवान श्री कृष्ण के भक्त – प्रेम का वर्णन करते हुए कहती हैं कि आप अपने भक्तों के सभी प्रकार के दुखों को हरने वाले हैं अर्थात दुखों का नाश करने वाले हैं।  मीरा उदाहरण देते हुए कहती हैं कि जिस तरह आपने द्रोपदी की इज्जत को बचाया और साडी के कपडे को बढ़ाते चले गए ,जिस तरह आपने अपने भक्त प्रह्लाद को बचाने के लिए नरसिंह का शरीर धारण कर लिया और जिस तरह आपने हाथियों के राजा भगवान इंद्र के वाहन ऐरावत हाथी को मगरमच्छ के चंगुल से बचाया था ,हे ! श्री कृष्ण उसी तरह अपनी इस दासी अर्थात भक्त के भी सारे दुःख हर लो अर्थात सभी दुखों का नाश कर दो।   

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मीरा के दोहे पद – 4

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो..

वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु किरपा करि अपनायो। पायो जी मैंने…

जनम जनम की पूंजी पाई जग में सभी खोवायो। पायो जी मैंने…

खरचै न खूटै चोर न लूटै दिन दिन बढ़त सवायो। पायो जी मैंने…

सत की नाव खेवटिया सतगुरु भवसागर तर आयो। पायो जी मैंने…

मीरा के प्रभु गिरिधर नागर हरष हरष जस गायो। पायो जी मैंने…

हिन्दी अर्थ :-

कृष्ण की भक्ति में लीन रहने वाली मीराबाई कहती हैं, मुझे राम रूपी बड़े धन की प्राप्ति हुई हैं। मेरे सद्गुरु ने कृपा करके ऐसी अमूल्य वस्तु भेट की हैं, उसे मैंने पूरे मनोयोग से अपना लिया हैं। उसे पाकर मुझे लगा मुझे ऐसी वस्तु प्राप्त हो गईं हैं, जिसका जन्म-जन्मान्तर से इन्तजार था। अनेक जन्मो में मुझे जो कुछ मिलता रहा हैं बस उनमे से यही नाम मूल्यवान प्रतीत होता हैं।

यह नाम मुझे प्राप्त होते ही दुनिया की अन्य चीजे खो गईं हैं। इस नाम रूपी धन की यह विशेषता हैं कि यह खर्च करने पर कभी घटता नही हैं, न ही इसे कोई चुरा सकता हैं, यह दिन पर दिन बढता जाता हैं। यह ऐसा धन हैं जो मोक्ष का मार्ग दिखता हैं। इस नाम को अर्थात श्री कृष्ण को पाकर मीरा ने ख़ुशी – ख़ुशी से उनका गुणगान किया है।

मीरा के दोहे पद – 5

मन रे परसी हरी के चरण

सुभाग शीतल कमल कोमल

त्रिविध ज्वालाहरण

जिन चरण ध्रुव अटल किन्ही रख अपनी शरण

जिन चरण ब्रह्माण भेद्यो नख शिखा सिर धरण

जिन चरण प्रभु परसी लीन्हे करी गौतम करण

जिन चरण फनी नाग नाथ्यो गोप लीला करण

जिन चरण गोबर्धन धर्यो गर्व माधव हरण

दासी मीरा लाल गिरीधर आगम तारण तारण

मीरा मगन भाई

लिसतें तो मीरा मगनभाई

हिन्दी अर्थ :-

इस दोहे में मीराबाई जी कहती हैं कि उनका मन हमेशा ही श्री कृष्ण के चरणों में लीन हैं, ऐसे कृष्ण जिनका मन शीतल हैं, जिनके चरणों में ध्रुव हैं, जिनके चरणों में पूरा ब्रम्हांड हैं पृथ्वी हैं और जिनके चरणों में शेष नाग हैं| जिन्होंने गोवर धन को उठा लिया था, ये दासी मीरा का मन उसी हरी के चरणों, उनकी लीलाओं में लगा हुआ हैं.

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मीरा के दोहे पद – 6

मतवारो बादल आयें रे

हरी को संदेसों कछु न लायें रे

दादुर मोर पापीहा बोले

कोएल सबद सुनावे रे

काली अंधियारी बिजली चमके

बिरहिना अती दर्पाये रे

मन रे परसी हरी के चरण

लिसतें तो मन रे परसी हरी के चरण

हिन्दी अर्थ :-

बादल गरज कर आ रहे हैं लेकिन हरी का कोई संदेशा नहीं लाए। वर्षा ऋतू में मोर ने भी पंख फैला लिए हैं और कोयल भी मधुर आवाज में गा रही हैं।और काले बदलो की अंधियारी में बिजली की आवाज से कलेजा रोने को हैं। विरह की आग को बढ़ा रहा हैं। मन बस हरी के दर्शन का प्यासा हैं।

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मीरा के दोहे पद – 7

मन रे परसी हरी के चरण
सुभाग शीतल कमल कोमल
त्रिविध ज्वालाहरण
जिन चरण ध्रुव अटल किन्ही रख अपनी शरण
जिन चरण ब्रह्माण भेद्यो नख शिखा सिर धरण
जिन चरण प्रभु परसी लीन्हे करी गौतम करण
जिन चरण फनी नाग नाथ्यो गोप लीला करण
जिन चरण गोबर्धन धर्यो गर्व माधव हरण
दासी मीरा लाल गिरीधर आगम तारण तारण
मीरा मगन भाई
लिसतें तो मीरा मगनभाई

हिन्दी अर्थ :-

मीरा का मन सदैव कृष्ण के चरणों में लीन हैं.ऐसे कृष्ण जिनका मन शीतल हैं. जिनके चरणों में ध्रुव हैं. जिनके चरणों में पूरा ब्रह्माण हैं पृथ्वी हैं. जिनके चरणों में शेष नाग हैं. जिन्होंने गोबर धन को उठ लिया था. ये दासी मीरा का मन उसी हरी के चरणों, उनकी लीलाओं में लगा हुआ हैं.

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मीरा के दोहे पद – 8

तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई|

छाड़ि दई कुलकि कानि कहा करिहै कोई||

हिन्दी अर्थ :-

मेरे ना पिता हैं, ना माता, ना ही कोई भाई पर मेरे हैं गिरधर गोपाल.

मीरा के दोहे पद – 9

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोई,

जाके सिर मोर मुकट मेरो पति सोई..

हिन्दी अर्थ :-

इस दोहे में मीराबाई जी कहती हैं कि- मेरे तो बस श्री कृष्ण हैं जिसने पर्वत को उंगली पर उठाकर गिरधर नाम पाया है। इसके अलावा मैं किसी को अपना नहीं मानती। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जिसके सिर पर मौर का पंख का मुकुट हैं वही  मेरे पति हैं।

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मीरा के दोहे पद – 10

स्याम म्हाने चाकर राखो जी,
गिरधारी लाला म्हाँने चाकर राखोजी।

चाकर रहस्यूँ बाग लगास्यूँ नित उठ दरसण पास्यूँ।
बिन्दरावन री कुंज गली में , गोविन्द लीला गास्यूँ।
चाकरी में दरसन पास्यूँ, सुमरन पास्यूँ खरची।
भाव भगती जागीरी पास्यूँ , तीनूं बाताँ सरसी।
मोर मुगट पीताम्बर सौहे , गल वैजन्ती माला।
बिन्दरावन में धेनु चरावे , मोहन मुरली वाला।
ऊँचा ऊँचा महल बनावँ बिच बिच राखूँ बारी।
साँवरिया रा दरसण पास्यूँ ,पहर कुसुम्बी साड़ी।
आधी रात प्रभु दरसण ,दीज्यो जमनाजी रे तीरा।
मीराँ रा प्रभु गिरधर नागर , हिवड़ो घणो अधीरा।

हिन्दी अर्थ :-

इस पद में कवयित्री मीरा श्री कृष्ण के प्रति अपनी भक्ति भावना को उजागर करते हुए कहती हैं कि हे !श्री कृष्ण मुझे अपना नौकर बना कर रखो अर्थात मीरा किसी भी तरह श्री कृष्ण के नजदीक रहना चाहती है फिर चाहे नौकर बन कर ही क्यों न रहना पड़े।  मीरा कहती हैं कि नौकर बनकर मैं बागीचा लगाउंगी ताकि सुबह उठ कर रोज आपके दर्शन पा सकूँ। मीरा कहती हैं कि वृन्दावन की संकरी गलियों में मैं अपने स्वामी की लीलाओं का बखान करुँगी।  मीरा का मानना है कि नौकर बनकर उन्हें तीन फायदे होंगे पहला – उन्हें हमेशा कृष्ण के दर्शन प्राप्त होंगे , दूसरा- उन्हें अपने प्रिय की याद नहीं सताएगी और तीसरा- उनकी भाव भक्ति का साम्राज्य बढ़ता ही जायेगा।         

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मीरा श्री कृष्ण के रूप का बखान करते हुए कहती हैं कि उन्होंने पीले वस्त्र धारण किये हुए हैं, सर पर मोर के पंखों का मुकुट विराजमान है और गले में वैजन्ती फूल की माला को धारण किया हुआ है। वृन्दावन में गाय चराते हुए जब वह मोहन मुरली बजाता है तो सबका मन मोह लेता है। मीरा कहती है कि मैं बगीचों के बिच ही ऊँचे ऊँचे महल बनाउंगी और कुसुम्बी साड़ी पहन कर अपने प्रिय के दर्शन करुँगी अर्थात श्री कृष्ण के दर्शन के लिए साज श्रृंगार करुँगी। मीरा कहती हैं कि हे ! मेरे प्रभु गिरधर स्वामी मेरा मन आपके दर्शन के लिए इतना बेचैन है कि वह सुबह का इन्तजार नहीं कर सकता। मीरा चाहती है की श्री कृष्ण आधी रात को ही जमुना नदी के किनारे उसे दर्शन दे दें।

मीरा के दोहे– 11

माई री ! मै तो लियो गोविन्दो मोल |
कोई कहे चान, कोई कहे चौड़े, लियो री बजता ढोल ||
कोई कहै मुन्हंगो, कोई कहे सुहंगो, लियो री तराजू रे तोल |
कोई कहे कारो, कोई कहे गोरो, लियो री आख्या खोल ||
याही कुं सब जग जानत हैं, रियो री अमोलक मोल |
मीराँ कुं प्रभु दरसन दीज्यो, पूरब जन्म का कोल ||

हिन्दी अर्थ :-

मीरा बाई अपनी सखी से कहती हैं- माई मेने श्री कृष्ण को मोल ले लिया हैं. कोई कहता हैं, अपने प्रियतम को चुपचाप बिना किसी को बताए पा लिया हैं. कोई कहता हैं, खुल्लमखुला सबके सामने मोल लिया हैं. मै तो ढोल-बजा बजाकर कहती हु बिना छिपाव दुराव सभी के सामने लिया हैं. कोई कहता हैं, तुमने सौदा महंगा लिया हैं तो कोई कहता हैं सस्ता लिया हैं. अरे सखी मेने तो तराजू से तोलकर गुण अवगुण देखकर मौल लिया हैं. कोई काला कहता हैं तो कोई गोरा मगर मैने तो अपनी आँखों खोलकर यानि सोच समझकर गोविन्द को खरीदा हैं.

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मीरा बाई कहती हैं ,कि कृष्ण को प्राप्त करने के लिए मुझे कठिन जतन करना पड़ा. मेरे लिए वह बहुमूल्य वस्तु हैं, जिसकी कीमत आंकी नही जा सकती. लोग बस इंतना ही जानते हैं, कि मैंने कृष्ण को गोद लिया हैं. मगर मेने यु ही नही लिया हैं. सोच समझकर आँखे खोलकर लिया हैं. मीरा कहती हैं, हे प्रभु मुझे दर्शन दीजिए. मुझे दर्शन देने के लिए आपने पुनर्जन्म लेने का वादा कर रखा हैं. अब आप अपने वचन को निभाइए.

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