भगवान परशुराम की जीवनी इतिहास और उनसे जुडी कथाये

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Parshuram Biography History Story in Hindi

भगवान परशुराम की जीवनी, इतिहास और कथाये

भगवान परशुराम ऋषि जमदग्नि के पुत्र थे जिनकी माता रेणुका थी जिनके वे पाचवी सन्तान थे, ऋषि जमदग्नि वही ऋषि थे जिनको सप्तऋषियों में स्थान है, भगवान परशुराम को भगवान श्रीहरी विष्णु के छटवे अवतार माने जाते है, जो की क्रोधित मुनि थे, इनके बारे में कहा जाता है की भगवान परशुराम ने 21 बार इस धरती को छत्रिय विहीन कर दिया था, और कहा जाता है की इन्होने अपनी माँ का गला काट दिया था, और फिर पिता के आशीर्वाद से उन्होंने अपनी माता को पुनर्जीवित कर दिया था.

तो चलिए भगवान परशुराम की जीवनी इतिहास और कथाये | Parshuram Biography History Story के बारे में जानते है.

भगवान परशुराम की जीवनी इतिहास और कथाये

Parshuram Biography History Story in Hindi

Parshuram Biography History Storyभगवान परशुराम का जन्म त्रेतायुग के शुरू और सतयुग के अंत काल में हुआ था, जो की भगवान विष्णु के छटवे अवतार माने जाते है, इनके पिता का नाम ऋषि जमदग्नि और माता का नाम रेणुका थी, पौराणिक कथाओ के अनुसार भगवान परशुराम का जन्म इनके पिता द्वारा किये गये पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न होकर देवराज इंद्र ने प्रसन्न होकर वरदान दिया था, जो की इनकी माता रेणुका से इनका जन्म बैसाख महीने के शुक्ल तृतीया को इनका जन्म हुआ था.

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जमदग्नि के पुत्र होने के कारण इनका नाम जामदग्न्य और शिव जी मिले परशु के कारण इनका नाम परशुराम पड़ा था. बाल्यकाल में ही भगवान परशुराम ने अपने माता पिता से अस्त्र-शस्त्र की विद्या सीख लिया था.  और उनमे जन्म से दैवीय गुण के विलक्षण प्रतिभा दिखने लग गया था.

भगवान परशुराम और माता रेणुका के वध की कहानी

Parshuram Mother History Katha Story in Hindi

परशुराम का जन्म भले ही ब्राह्मण कुल में हुआ था लेकिन वे जन्म से ही क्षत्रिय गुणों वाले थे, एक बार की बात है, इनके पिता जब यज्ञ में तल्लीन थे तो इनकी माता जल लेने नदी चली गयी, जहा पर राजा चित्ररथ स्नान कर रहे थे, जिन्हें देखकर इनकी माता रेणुका आसक्त हो गयी थी, जिस बात को इनके पिता जमदग्नि ने अपने तप के बल से अपनी पत्नी का कृत्य जान चुके थे, फिर उन्होंने अपने पांचो पुत्रो को माता का वध करने का आदेश दिया, लेकिन दयावश किसी ने अपनी माता का वध नही किया.

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तो फिर पिता का आदेश पाकर भगवान परशुराम तुरंत अपनर फरसे से अपनी माता का गला कांट दिया, जिससे उनके पिता अपने पुत्र की आज्ञा मानने से प्रसन्न हो गये, जिससे फिर प्रसन्न होकर वरदान मागने को कहा तो भगवान परशुराम ने अपनी माता का जीवनदान मांग लिया, जिसके बाद ऋषि जमदग्नि ने वापस अपनी पत्नी को जिन्दा कर दिया.

भगवान परशुराम के 21 बार छत्रियो के संहार की रोचक कहानी

Amazing Story of Parshuram in Hindi

एक बार की बात है, जब महिष्मती देश के राजा कार्तवीर्य अर्जुन जो की सहत्रार्जुन के नाम से भी जाना जाता था, रास्ते से गुजर रहे है, तो अपनी थकावट के चलते ऋषि जमदग्नि के आश्रम के पास आराम करने के लिए जगह माँगा, तो ऋषि जमदग्नि ने विश्राम के लिए उचित स्थान का प्रबंध कर दिया और देवराज इंद्र द्वारा मिले कामधेनु गाय की कृपा से राजा सहित पूरी सेना को भोजन पानी आदि की व्यवस्था करा दी. इतने विशाल सेना और लोगो के अचानक से भोजन पानी की व्यवस्था से राजा कार्तवीर्य अर्जुन चकित रह गया और इसका बारे में ऋषि जमदग्नि से पूछा तो ऋषि जमदग्नि ने बताया की यह अलौकिक गाय माता कामधेनु की कृपा बताया,

फिर लालचवश राजा ने ऋषि जमदग्नि से वह माँगा तो ऋषि जमदग्नि ने उसे देने से साफ़ साफ मना कर दिया, जिसके बाद राजा ने अपने बल से उस कामधेनु गाय को ऋषि जमदग्नि के आश्रम से छुड़ा ले गये. जिस कारण से ऋषि जमदग्नि बहुत ही क्रोधित हुए और यह सारी बात अपने पुत्र परशुराम को बताया, परशुराम जी पिता के अपमान की बात सुनकर बहुत ही क्रोधित हुए और अपने पिता के अपमान का बदला लेने का प्रण किया.

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इसके बाद भगवान परशुराम राजा कार्तवीर्य के राज दरबार में पहुच गये और वही पर अपने परसु (फरसे) से सहत्रार्जुन के हजार भुजाओ सहित उसका सर धड से अलग कर दिया, जिसके बाद अपने पिता के बदला लेने हुए सहत्रार्जुन के पुत्रो ने धोखे से ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दिया, जिनके मृत्यु के वियोग में उनकी माता रेणुका भी अपने पति ऋषि जमदग्नि के चिताग्नि में खुद को सती कर लिया.

ये सारी घटना जानने के बाद भगवान परशुराम बहुत ही क्रोधित हुए और फिर सहत्रार्जुन के सभी पुत्रो के साथ इक्कीस बार पूरे धरती को छत्रिय विहीन (हैहयवंशी समाज के छत्रिय) कर दिया.

महाभारत काल में भगवान परशुराम की कथाये

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भगवान परशुराम को अमरत्व प्रदान है इसलिए वे त्रेतायुग के बाद भी महाभारत काल यानि द्वापरयुग में उनके होने का जिक्र मिलता है,

जब कर्ण को गुरु द्रोणाचार्य ने सूतपुत्र होने कारण शस्त्र विद्या देने से मना कर दिया था तो कर्ण भगवान परशुराम के पास गये, और फिर यह सारी बात बता दिया, भगवान परशुराम जो की सिर्फ ब्राह्मणों को अपना शस्त्र- शास्त्र की शिक्षा देते थे, और छत्रियो को शिक्षा देने के विरुद्ध थे, और फिर सूतपुत्र होने कारण भगवान परशुराम ने कर्ण को अपना शिष्य बना लिया,

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फिर एक सूतपुत्र समजकर भगवान परशुराम ने कर्ण को सभी विद्याये सीखा दिया, एक दिन की बात है, भगवान परशुराम कर्ण के पैरो पर अपना सर रखकर सो रहे थे की इतने में एक भौरा आया और कर्ण के पैरो में काटना लगा, जो बहुत ही विषैला था, उसके काटने से कर्ण के पैरो से खून निकलने लगा था, लेकिन कर्ण अपने गुरु के नीद में व्यवधान न आये, टस से मस भी नही हुए, फिर थोड़ी देर बाद जब गुरु परशुराम की नींद खुली तो सारा दृश्य देखकर और कर्ण के खून को देखकर तुरंत समझ गये की यह कोई छत्रिय ही होगा और फिर उन्होंने कर्ण से पूछा की कर्ण कौन है उसके असलियत के बारे में पूछा, क्युकी भगवान परशुराम जानते थे कोई छत्रिय ही होगा जो इतना बड़ा कष्ट आसानी से झेल सकता है.

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लेकिन कर्ण खुद को एक सूतपुत्र बताते रहे, जिससे क्रोधित होकर कर्ण को श्राप दिया की उनके द्वारा दिया गया विद्द्या भूल जाये, जिसके बाद कर्ण भगवान परशुराम द्वारा दिया गयी सारी शस्त्र- शास्त्र की विद्या भूल गया और दुखी मन से वापस अपने घर को लौट गया.

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इसके अलावा भगवान परशुराम के जीवन का वर्णन भगवान गणेश के दंत कथा, राम सीता के स्वयंबर कथा, महाभारत के कई प्रसंगों में जिक्र मिलता है. जिस कारण से इन्हें अमर माना जाता है और पुराणों के अनुसार कलयुग में भगवान् कल्कि के अवतार में भी भगवान परशुराम का जिक्र मिलता है, जो की कलयुग के अंत तक आने वाला समय ही बता सकता है.

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परशुराम जयंती

Parshurama Jayanti in Hindi

जिस कारण से प्रत्येक वर्ष भगवान परशुराम की जयंती हिन्दू पंचांग के वैशाख माह की शुक्ल पक्ष द्वितीया को मनाई जाती है. इसे “परशुराम द्वादशी” या “ परशुराम जयंती” के नाम से मनाया जाता है. इस साल 2020 में परशुराम जयंती 25 अप्रैल को है.

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