सोच बदलो देश बदलेंगा स्वच्छता अभियान Toilet Movie Review In Hindi

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Soch Badlo Desh Badlega Toilet Movie Ek Prem Katha / If you change nothing, nothing will change

आपकी एक सोच देश बदल सकता है कोशिश तो करिये

फिल्मे किसी भी समाज का दर्पण होती है जबसे हमारे समाज पे फिल्मो का प्रचलन हुआ कही न कही इन्ही फिल्मो के माध्यम से हमारे समाज के सामजिक मुद्दे जैसे अच्छाईयो और बुराईयों को उठाया जाता है जो कही न कही हमारे मन मस्तिष्क पर इन फिल्मो का गहरा प्रभाव भी पड़ता है ऐसे में यदि यही फिल्मे सामाजिक कुरूतियो के खिलाफ हो तो ज्यादा से ज्यादा लोग प्रभावित होते है कही न कही यही फिल्मे समाज में एक नई सोच सोचने पर मजबूर भी करते है

ऐसे तो हमारे देश में स्वछता एक गम्भीर मुद्दा है जिसकी वजह से हर साल नये नये प्रकार के रोगों का जन्म होता है जो लोगो के लिए एक अभिशाप ही है ऐसे में जरा सोचिये अगर अपना घर समाज ही स्वच्छ न हो तो वो भला देश क्या स्वच्छ होंगा . ऐसे में प्रर्दर्शित फिल्म Toilet Ek Prem Katha यानि शौचालय में सामजिक मुद्दे को दिखाया गया है

जरा सोचिये आज भी हमारे देश भारत में 58% से अधिक लोग खुले में शौच करने पर मजबूर है जरा और सोचिये जिस देश की आधे से अधिक आबादी खुले में शौच करती हो उस देश को भला कभी स्वच्छ बनाया जा सकता है शायद कभी नही ………

ऐसे में प्रदर्शित यह फिल्म Toilet Ek Prem Katha जो कही न कही वर्तमान प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान / Clean India योजना से ही प्रेरित है और इस फिल्म में दिखाया गया है की कैसे आज भी बिना शौचालय के न होने से खासकर महिलाओ को खुले में शौच करने पर मजबूर होना पड़ता है और इस दौरान उन्हें किन किन अनचाहे परिस्थितियो का सामना भी करना पड़ता है तो आईये जानते है Toilet Ek Prem Katha के बारे में और इस मूवी से हम क्या सीख ले सकते है यह भी जानते है

टॉयलेट एक प्रेम कथा मूवी एक नजर में

Toilet Ek Prem Katha Film Review in Hindi

फिल्म की कहानी की शुरुआत भारत के एक राज्य के गाव की कहानी है जिसमे मुख्य कलाकार केशव यानी फिल्म के हीरो अक्षय कुमार जिद्दी स्वाभाव वाले जो ठान लिए वो बस करना ही है और उनकी प्रेमिका जया यानी भूमि पेड्नेकर जो बाद में उनकी पत्नी बन जाती है के इर्दगिर्द घुमती है जया चुकी अपने क्लास की Topper और खुले विचारो वाली लडकी है उसके घर वाले भी लड़के लड़की में कोई भेद नही समझते है जिसके बाद एक नजर में प्यार होने के बाद यही प्यार शादी में बदल जाता है

लेकिन जया को क्या पता उसके ससुराल यहाँ तक दूर दूर तक गाव में कोई भी सार्वजनिक शौचालय तक नही है उसे खुले में रात के अंधेरो में सारी महिलाओ के साथ शौच के लिए जाना पड़ेगा, यही बात जया को अच्छी नही लगती है लेकिन दिल से प्यार करने वाले केशव अपनी पत्नी के ख़ुशी के लिए शौचालय ले जाने के लिए तरह तरह के जुगाड़ खोजते है जिसके चलते कभी ट्रेन में टॉयलेट का सहारा लेना पड़ता है

जिससे सिर्फ एक शौचालय न होने की वजह से काफी परेशान हो जाती है और एक दिन उसी ट्रेन से अपने मायके वापस चली आती है जो की उस गाव में इस प्रकार की पहली सनसनीखेज घटना बन जाती है और अपने हक की खातिर लड़ने वाली जया अपने पति से यही मांग करती है वह तभी ससुराल लौटेगी जब खुद उसके घर में टॉयलेट होगा, फिर इसी के बाद केशव का सरकारी सिस्टम और संस्कृति के बीच सीधा टकराव होता है और अंत में जीत जया होती है और गाव में सरकार और लोगो द्वारा शौचालय बनाया जाता है और इस प्रकार जहा एक नई सोच है वही बदलाव है इस कथन को फिल्म सार्थक करती है

सोच बदलने वाली नजरिये का विश्लेषण

Mind Thinking Change

अंग्रेजी में एक कहावत है – Thinking can change the world यानी आप जैसा सोचोगे वैसा ही यह दुनिया में परिर्वतन होगा अर्थात दुनिया में परिर्तन लाना है तो सबसे पहले खुद को बदलना होगा अपनी सोच बदलनी होगी तभी ये दुनिया बदल सकती है

खुले विचारो का सोच

Open Mind Thinking

इस फिल्म के माध्यम से दिखाया गया है यदि लडकियों को आगे बढने का मौका दिया जाय तो वे भी अपने पढाई में टॉप कर सकती है और जैसा की आज भी हमारी सोच होती है की यदि लड़किया पढ़लिख लेंगी तो वे घरबार का काम नही करेगी और सिर्फ वे नौकरी ही करना पसंद करेगी इसके ठीक विपरीत फिल्म के माध्यम से बताया गया है लडकियों का पढना कितना अनिवार्य है हर लडकी का यही सपना होता है की जब भी  उसकी शादी हो उसे प्यार करने वाला पति मिले और अपने घर गृहस्थी में अपनी पत्नी का हाथ बटाये क्यूकी जैसा की सब जानते है किसी भी गृहस्थी को चलाने के लिए गाडी के दोनों पहियों का होना उतना ही आवश्यक है तभी कोई घर आसानी से चल सकता है और ऐसे में लड़किया पढ़ी लिखी हो अपने सोच के जरिये अपनेघर गाव समाज सबका भला कर सकती है

अक्सर हमारे देश के गावो में आज भी ताना मारा जाता है लडकियों को ज्यादा पढ़ा लिखाकर क्या करना, क्यूकी उन्हें बाद में चूल्हा चौका ही तो करना है

लेकिन इसके ठीक उलट यदि लड़की पढ़ी लिखी हो तो वही लड़की अपने घर के कामो के साथ साथ आने पति के कामो में भी हाथ बटाती है यदि जया पढ़ी लिखी नही होती तो भला वो कैसे देश के सिस्टम के बारे में जानती की कौन सा काम किस विभाग द्वारा हो सकता है या किससे मिलना है क्या करना है कितने देश में शौचालय तक जैसे प्रोजेक्ट में भी घोटाले होते है इन सबकी जानकारी उसे पढाई के अभाव में मिल नही पाता. और फिर न तो वह कभी अपने पुराने सोच वाले लोगो से लड़ पाती और न ही सरकारी सिस्टम से कैसे काम लिया जाय जान नही पाती.

और फिर अंत में औरो महिलाओ की तरह उसे सदियों चली आ रही परम्परा का हिस्सा मात्र बनकर रह जाती और अपने एक छोटी सी सोच को भी खत्म कर लेती, इससे यही पता चलता है की लडकियों को हमारे समाज में पढना अति आवश्यक है और यदि लड़किया पढ़ी रहेगी तो आने वाली पीढ़ी भी इन पढ़े लिखे माता पिता के बदौलत बच्चे भी जरुर पढेगे

इसलिए कहा भी गया है – पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढेगा इंडिया

शौचालय – एक संकीर्ण मानसिकता का परिचायक

Toilet – A Lower Mind Thinking

हमारा देश आज भी गावो में बसता है आज भी हमारे देश की आधे ससे अधिक आबादी गावो में निवास करती है और ऐसे में इन गावो में आज भी सदियों चली आ रही परम्परा को बखूबी निभाया जा रहा है

इस फिल्म के माध्यम से दिखाया गया है गाव के लोग आज भी सोचते है की जिस आगन में तुलसी की पूजा होती है भला उस घर में शौचालय कैसे बनाया जा सकता है इससे तो हमारा धर्म ही भ्रष्ट हो सकता है

और इसी बात को जिक्र करते हुए शाश्त्री जी कहते है – “जिस आंगन में तुलसी लगाते है वहा शौच करना शुरू कर दे”

लेकिन सोचिये जिस घर में बीमार बूढ़े माँ बाप या छोटे बच्चे हो उन्हें तो शौच तो जाना ही पड़ेगा और में इन लोगो को लम्बे इन्तजार होने का बाद दूर खाली मैदानों जंगलो में शौच के लिए जाना पड़े तो क्या ये बीमार बुड्डे माँ बाप शौच के लिए जा पायेगे, नही न ऐसे में तो खुद का एक शौचालय हो तो सभी को आसानी से शौच के लिए जा सकते है और अगर शौचालय बनवाने से लगता है की धर्म भ्रष्ट हो सकता है तो अपने लिए ना सही बुड्ढे माँ बाप अपनी प्यारी बीबी, बच्चो के लिए तो घर से बाहर किसी भी कोने में एक शौचालय तो बनवा ही सकते है

महिलाओ को पर्दों में रखना और शौच के लिए खुले में जाने देना – विरोधाभास सोच

आज भी भारतीय सभ्यता और संस्कृति में पर्दे का अहम स्थान है और होना भी चाहिए मै इसका विरोध नही करता क्यूकी यदि महिलाये अपने रीती रिवाज के अनुसार कपड़े पहनती है और सर ढकती है और बडो के सामने घुंघट करती है तो इसमें भी बडो के प्रति एक इज्जत और सम्मान देने वाली बात दिखती है.

लेकिन जरा सोचिये जिस घर गाव में आज भी शौचालय न हो तो फिर इस घुंघट पर्दा रखने से क्या फायदा. ये तो वही बात हुई की दिन के उजाले में सबके सामने संस्कारी बनो और फिर शाम ढलते ही खुले में शौच करो जहा कभी भी कोई भी आ सकता है फिर ऐसे रीती रिवाज तो सिर्फ एक सामाजिक ढाचा ही बनकर रह जाता है यदि हम महिलाओ को इज्जत देना जानते है तो फिर उन्हें क्यू खुले में शौच करने के लिए भेजे ये भी तो है ना , यदि उस अँधेरे में कोई जानवर या कोई उचनीच बात ही हो जाए तो फिर अपना कहा मुह छुपाते फिरेंगे.

इसी पर कटाक्ष करते हुए जया कहती है –

मर्द तो घर के पीछे बैठ जायेगे पर हम तो औरते है

हमे तो हर चीज के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी

इस फिल्म में यही मुख्य सामाजिक मुद्दा है जिसे पहली बार जया अपने पति के सामने उठाती है अगर केशव समझदार न होता तो वह भी औरो की तरह अपनी बीबी को मारपीटकर समझा बुझा लेता और सबकी तरह जया भी अपनों की ख़ुशी की खातिर अपने इज्जत का गला घोट देती और फिर सदियों चली आ रही परंपरा भी वैसा बना रहता

लेकिन इसके उलट केशव यदि अपनी बीबी को प्यार करता है तो उसकी ख़ुशी की खातिर हर रिस्क लेने को भी तैयार होता है

और केशव कहते है – “अपनी औरत का सबके सामने खुले में प्रदर्शन करना धरम है या खुले में शौच करना मौक्षदायिनी है”

और अंत इसी शौचालय की मांग के चलते यह प्यार बीच का प्यार तलाक के रूप भी ले लेता है लेकिन दिल से तो दोनों एक दुसरे से जुड़े ही होते है और यही आपसी समझ उन्हें अपनी मंजिल के विजय की तरफ ले जाता है

महिला शक्ति की ताकत 

Woman Unity Power

इस फिल्म के माध्यम से यह भी दिखाया गया है यदि महिलाये ठान ले तो निश्चित ही समाज में परिवर्तन ला सकती है जिसके लिए खुद पढ़ी लिखी जया अपने ससुर से अपने हक की लड़ाई के लिए खुलकर शौचालय की मांग करती है चाहे उस समय उसे विरोध का सामना ही क्यू न करना पड़ा लेकिन उसकी यही एक छोटी सी कोशिश सामाजिक क्रांति का रूप ले लेती है

इसी दौरान एक बार केशव भी बोलता है की – “महिलाये अपनी दुर्दशा के लिए खुद जिम्मेदार है वे खुद नही चाहती की उनकी हक का फैसला उनके हाथ में आये और यही औरते अपनी इस सोच के चलते दूसरी औरतो की दुश्मन बनी हुई है” फिर उसी गाव की महिलाये भी अंत में सोचने पर मजबूर हो जाती है आखिर वे अपने हक की लडाई में पीछे क्यू रहे और फिर सभी एक साथ जया के साथ अपने पतियों को तलाक देने पहुच जाती है और यही महिलाओ की शक्ति जया के सोच की जीत होती है

सरकारी तंत्र और हमारी मानसिकता

इस फिल्म के माध्यम से यह भी बताया गया है जहा कही यदि कोई सरकार कोई अभियान चलाती भी तो कैसे संकीर्ण मानसिकता वाले लोग अपनी सोच के चलते इन योजनाओं को लागू भी नही होने देते है जब केशव के गाव में सरकार के तरफ से पहले शौचालय निर्माण को लेकर प्रशासन जागा था तू यही जनता अपनी छोटी सोच के चलते इन योजनाओं को लागू नही होने देती है जिसके चलते कही न कही घोटाले का आसान रास्ते भी खुलते है

लेकिन यदि प्रशासन चुस्त और दुरुस्त हो तो कोई भी प्रोजेक्ट को आसानी से पूरा भी किया जा सकता है जिसका उदाहरण देते हुए खुद वाका के मुख्यमंत्री साहब कहते है – “लोग तब तक कोई खुद काम नही करते जबतक उनकी समस्या खुद की निजी न हो तब तक कोई काम नही करता है”

इसके बाद एक्शन लेने के बाद तो पूरा प्रशासन तंत्र सकते में आ जाता है और 11 महीने का काम 3 दिन के भीतर ही शुरू हो जाता है यानी यदि कुछ करना है तो सबसे पहले खुद ही आगे आना होगा, और जब हमारी समस्या सबकी समस्या महसूस होगी तभी लोग एक साथ एक जुट होंगे

शौचालय और स्वच्छ भारत अभियान की जरूरत 

Toilet And Clean India Mission

अब आप सोच रहे होंगे की शौचालय और स्वछता में क्या समानता है जिसके चलते इस ज्वलंत मुद्दे को स्वछता अभियान से जोड़ा गया है ऐसा सोचना ठीक ही है अब जरा सोचिये देश में एक भी शौचालय न हो तो लोग खुले में ही शौच करे चलो ठीक है गावो में तो दूर दराज शौचालय के लिए लोग ठिकाने ढूढ़ ही लेंगे लेकिन जो लोग शहरो में है वो कहा जायेगे, आप सडक पर जा रहे है आपको ही शौच आ जाये या सडक के किनारे लोग खुले में शौच करने के लिए बैठे हो तो फिर कैसा लगेगा. यानी जब यह समस्या हमे अपनी निजी लगने लगेगी तो हम जरुर शौचालय बनवाने के लिए एडी चोटी का जोर लगाना शुरू कर देंगे और फिर यही से शुरू होंगा

और इस फिल्म के माध्यम से यह भी समझाया गया है की “हमारी धरती सिर्फ एक शौचालय नही है – Nature is not a Toilet,यानी जहा जिसको मौका मिल जाये वही नही शुरू हो जाएगा, हर चीज के लिए नियमित स्थान बना है तो एक टॉयलेट भी बनवा लीजिये और करिए एक स्वच्छ भारत का निर्माण.

और जैसा की कहा भी गया है – जहा सोच है वही है शौचालय

शौचालय से लाभ

अब तो आप समझ ही गये होंगे की शौचालय होने से हमारे घर की बहु, बेटिया, माताए, बहने यहाँ तक की सभी लोग खुले में शौच करने के बजाय टॉयलेट में आराम से जा सकते है और इस प्रकार इस धरा को हर जगह गंदा करने और बीमारियों को पैदा होने से भी रोक लेते है

तो अब आप क्या चाहेगे की सरकार हमे शौचालय बनाने में मदद करे या हम यदि खाना खा सकते है तो अपने लिए एक शौचालय भी बनवा सकते है

तो देर किस बात की आप भी बढ़ाईए एक कदम स्वच्छता की ओर शौचालय बनवाईए और दूर दराज अपने गावो के लोगो को भी समझाईये शौचालय का महत्व और देश को गंदगी से मुक्त बनाए

आओ हम सब मिलकर बढ़ाये एक कदम स्वच्छता की ओर

तो आप सबको यह पोस्ट “सोच बदलो देश बदलेंगा स्वच्छता अभियान” कैसा लगा प्लीज हमे जरुर बताये

नोट – इस पोस्ट के माध्यम से किसी के भावनाओं को आहत करने का प्रयास नही किया गया है अगर इसकी समानता होती है तो इसे मात्र एक संयोग कहा जाएगा जो की यह विश्लेषण Toilet मूवी पर आधारित है

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